(दि। १३/११/१९८० को लिखी एक कविता मई यहाँ पेश कर रहा हु)
कोई दिल के द्वारे पे
धीरे-धीरे आता है।
फिर उस पे दस्तक दे
कही छुप जाता है।
दिल धड़कने लगता है।
कौन है जो आकर भी
कही छुप जाता है।
न रुला मेरे दिल को,
आ भी जा आ भी जा।
जब मै अकेले में
अंधेरे में बैठा हु
कोई आहट दे अंधेरे में खो जाता है
नज़रे फिर दूर दूर तक दौड़ती है
न मिलने पर किसी के
ये नज़रे उदास हो जाती है
न भूल मुझको तू
आ जा आ भी जा।
तेरे आने की आहट जब होती है
मेरे दिल के तार तब झन झना उठाते है
कोई धुन बजती है तेरी आहट पर
वो भी रुक जाती है, तेरे छुप जाने पर
मुझे आवाज तू दे, न भुला
आ भी जा आ भी जा.
तेरी याद आती है
बहारे खिल जाती है
सितारे निकल आते है
चाँद मुस्कराता है
फूल बरसते है
तेरे कदमो पर
न ठुकरा हमें
आ भी जा आ भी जा.
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November 28, 2009
अहम्...
(१२-२-१९८० को लिखी हुई एक कविता यहाँ आपके खिदमत में पेश कर रहा हु। )
अहम् न करो हे मानव,
न बनो तुम दानव,
अहम्,
तो दानव का प्रतिरूप है।
हे मानव,
तू अहम् करता है
इन कौडियों के सहारे
आँखे तरेरता है
क्यो अपने करेक्टर का नाश करता है
अरे
ये दौलत तो चार दिन की है
हाथ का मैल है ये तो
ये वो चीज है
जो आज यहाँ
कल वहा रहती है
आज तू धनवान है
कल निर्धन हो जाएगा
अरे
एक दिन एक काला कौवा आएगा
इन सोने की कौडियों को
मोती समझकर
और ख़ुद को हंस मानकर
निगल जाएगा
और तू देखता ही रह जाएगा
हो जाएगा
मोहताज तू कौड़ी कौड़ी के लिए
न पूछेगा तेरा भाई
न पूछेगा बेटा तुझे
तू एक जून रोटी के लिए
तरस जाएगा।
हे मानव अहम् न कर तू
न कर अहम्।
अहम् न करो हे मानव,
न बनो तुम दानव,
अहम्,
तो दानव का प्रतिरूप है।
हे मानव,
तू अहम् करता है
इन कौडियों के सहारे
आँखे तरेरता है
क्यो अपने करेक्टर का नाश करता है
अरे
ये दौलत तो चार दिन की है
हाथ का मैल है ये तो
ये वो चीज है
जो आज यहाँ
कल वहा रहती है
आज तू धनवान है
कल निर्धन हो जाएगा
अरे
एक दिन एक काला कौवा आएगा
इन सोने की कौडियों को
मोती समझकर
और ख़ुद को हंस मानकर
निगल जाएगा
और तू देखता ही रह जाएगा
हो जाएगा
मोहताज तू कौड़ी कौड़ी के लिए
न पूछेगा तेरा भाई
न पूछेगा बेटा तुझे
तू एक जून रोटी के लिए
तरस जाएगा।
हे मानव अहम् न कर तू
न कर अहम्।
November 27, 2009
November 21, 2009
खुबसूरत जिंदगी
ना कोई मूरत है,
ना कोई सूरत है,
ना कोई चाहत है,
ना कोई जरुरत है,
फिर भी ये जिंदगी
क्यो लगती इतनी खुबसूरत है।
ना कोई सपना है,
ना कोई सच है,
ना कोई साथी है,
ना कोई माझी है,
फिर भी ये जिंदगी
क्यो लगती इतनी खुबसूरत है।
ना कोई सूरत है,
ना कोई चाहत है,
ना कोई जरुरत है,
फिर भी ये जिंदगी
क्यो लगती इतनी खुबसूरत है।
ना कोई सपना है,
ना कोई सच है,
ना कोई साथी है,
ना कोई माझी है,
फिर भी ये जिंदगी
क्यो लगती इतनी खुबसूरत है।
November 12, 2009
बुढापा
मेरे घर के दरवाजे पर कोई दस्तक देता है
मै दरवाजा खोलता हु तो उसे देख हैरान होता हु
वो आया है मेरे दरवाजे पे बिन बुलाये मेहमान कि तरह
जिसे मै सब अपने आप से कोसो दूर रखना चाहते है
मै क्या करू उसे कैसे भागवु समझ नही पाता हु
समजते समजते हि शाम ढल जाती है
वो है कि दरवाजे पर से हटता हि नही है
क्या करू क्या न करू सोचते सोचते थक जाता हु
और उस आगंतुक को आपने घर मे हि पनाह दे देता हु
अपनी जिंदगी के अंत तक रहने के लिये
जिसका नाम लेने से भी लोग कतराते है
मै उसे अपने हि घर में पनाह देता हु
जिसे सब बुढापा कहते है उसे हि मै गले से लगाता हु.
मै दरवाजा खोलता हु तो उसे देख हैरान होता हु
वो आया है मेरे दरवाजे पे बिन बुलाये मेहमान कि तरह
जिसे मै सब अपने आप से कोसो दूर रखना चाहते है
मै क्या करू उसे कैसे भागवु समझ नही पाता हु
समजते समजते हि शाम ढल जाती है
वो है कि दरवाजे पर से हटता हि नही है
क्या करू क्या न करू सोचते सोचते थक जाता हु
और उस आगंतुक को आपने घर मे हि पनाह दे देता हु
अपनी जिंदगी के अंत तक रहने के लिये
जिसका नाम लेने से भी लोग कतराते है
मै उसे अपने हि घर में पनाह देता हु
जिसे सब बुढापा कहते है उसे हि मै गले से लगाता हु.
November 10, 2009
November 9, 2009
तलाश
मैंने अपना बचपन मध्य प्रदेश राज्य के नेपानगर नाम के छोटेसे शहर में बिताया है. यह शहर इसलिए कहरहा हु की पेपर मिल की वजह से यहाँ की बस्ती बहुत ही अच्छी है. १९६८ से १९७७ तक का मेरा जीवन पूरी तरह इसी शहर में बिता है. मै एक गरीब घर में पैदा हुआ था इसलिए झोपडी में रहता था. लेकिन पढाई में हमेशा प्रथम आता था. इसलिए स्कुल में सब टीचर मुझे चाहते थे. दोस्त भी सब मुझसे दोस्ती करते थे माफ करना मै अपनी ही तारीफ के पुल बंधने लग गया हु.
तो बात ये है की मेरे घर में लाईट की व्यवस्था न होने से पढाई में बहुत दिक्कत होती थी. इसलिए दोस्त लोग अपने घर बुला लेते थे. कई बार तो मेरे टीचर जो हॉस्टल में रहते थे वे भी मुझे पढाई करने के लिए उनके रूम पर बुला लेते थे. इस तरह मेरा जीवन व्यतीत हो रहा था. मेरे साथ पढ़ने वाला एक दोस्त था जिसका नाम था अविनाश माथुर. उसके पिता मिल में इंजिनीअर थे सो उन्हे रहने के लिए अच्छा घर मिला हुआ था. एक दिन वो दोस्त मुझे अपने घर ले गया. वहा उसने अपनी माँ से कुछ बात की और उसकी माँ ने मुझे परीक्षा के दिनों में उनके घर पढाई के लिये आने को कहा. इस तरह मै उनके घर रत को जाने लगा. रात में पढाई कृते वक्त उसकी माँ हमें बादाम का दूध पिने के लिये देती थी. उसकी छोटी बहन मेरे आने पर एक गाना गति थी " बम्बई से आया मेरा दोस्त, दोस्त को सलाम करो" उस समय यह गाना नया ही था. (उन दिनों मुंबई को बम्बई कहते थे).
परीक्षा होने पर फिर किसी और जगह हमारा मुकाम होता था. एक दिन पता चला वह दोस्त हमारा शहर छोड़ गया. कारन पता नहीं चला.लेकिन आज भी वो यद् आता है. उसकी तस्वीर मेरे पास है जो मै यहाँ दे रहा हु.
तो बात ये है की मेरे घर में लाईट की व्यवस्था न होने से पढाई में बहुत दिक्कत होती थी. इसलिए दोस्त लोग अपने घर बुला लेते थे. कई बार तो मेरे टीचर जो हॉस्टल में रहते थे वे भी मुझे पढाई करने के लिए उनके रूम पर बुला लेते थे. इस तरह मेरा जीवन व्यतीत हो रहा था. मेरे साथ पढ़ने वाला एक दोस्त था जिसका नाम था अविनाश माथुर. उसके पिता मिल में इंजिनीअर थे सो उन्हे रहने के लिए अच्छा घर मिला हुआ था. एक दिन वो दोस्त मुझे अपने घर ले गया. वहा उसने अपनी माँ से कुछ बात की और उसकी माँ ने मुझे परीक्षा के दिनों में उनके घर पढाई के लिये आने को कहा. इस तरह मै उनके घर रत को जाने लगा. रात में पढाई कृते वक्त उसकी माँ हमें बादाम का दूध पिने के लिये देती थी. उसकी छोटी बहन मेरे आने पर एक गाना गति थी " बम्बई से आया मेरा दोस्त, दोस्त को सलाम करो" उस समय यह गाना नया ही था. (उन दिनों मुंबई को बम्बई कहते थे).
परीक्षा होने पर फिर किसी और जगह हमारा मुकाम होता था. एक दिन पता चला वह दोस्त हमारा शहर छोड़ गया. कारन पता नहीं चला.लेकिन आज भी वो यद् आता है. उसकी तस्वीर मेरे पास है जो मै यहाँ दे रहा हु.
एक दिन की बात थी....
एक दिन कि बात थी
अंधेरी रात थी
वो बैठी मेरे साथ थी
चल रही बरसात थी
वो भिगी हुई थी
सहमी हुईसी थी
थंड से काप रही थी
हमने साथ रहने कि सौगंध खाई थी
फिर भी क्या हुआ
ऐ रब्बा कि वो मुझसे यु खफा हो गई
जिंदगी के अंधेरी गलीयारो मे
यु भटकने के लिये अकेला छोड गई
तुझे इतनी भी दया नाही आई
कि मै अकेले कैसे जी पाऊंगा
अंधेरी रात थी
वो बैठी मेरे साथ थी
चल रही बरसात थी
वो भिगी हुई थी
सहमी हुईसी थी
थंड से काप रही थी
हमने साथ रहने कि सौगंध खाई थी
फिर भी क्या हुआ
ऐ रब्बा कि वो मुझसे यु खफा हो गई
जिंदगी के अंधेरी गलीयारो मे
यु भटकने के लिये अकेला छोड गई
तुझे इतनी भी दया नाही आई
कि मै अकेले कैसे जी पाऊंगा
October 31, 2009
प्यार
प्यार का इजहार करू
इतना मै खुश नशीब कहा
प्यार का इंकार करू
इतना मै बद नशीब कहा।
इजहार करू या न करू
इंकार करू या न करू
प्यार तो प्यार ही रहेगा।
October 29, 2009
चाँद पर आशियाना
इस धरतीपर वास करानेवाला हर एक जिव अपने रहने के लिए आशियाना तलाशता है। हर प्राणी का बच्चा आपनी माँ की गोद में आशियाना पाता है। वाही उसके लिए आशियाना होता है। बड़ा होने पर वह भी अपने आशियाने की तलाश करना सुरु कर देता है। इन्सान मात्र इन सबसे अलग होता है। पैदा होने से अंत तक अपने ही माता -पिता के साये में मतलब आशियाने में बड़ा होता है। लेकिन जनसँख्या बढ़ जाने से नए नए आशियाने तयार किए जाते है। प़ता नही वह खुदा ऊपर से जब देखता होगा तो क्या सोचता होगा। उसे चारो तरफ घर ही घर नजर आते होंगे। इन्सान ही इन्सान नजर आहते होंगे। वही भगवान जब पृथ्वी के भविष्य में झांक कर देखता होगा तो क्या पाता होगा। अंदाज लगाइए जरा। क्या नजारा दिखता होगा उसे इस धरती का। भगवान को धरती पर चारो तरफ शिर्फ और शिर्फ घर, इमारते, बड़े बड़े मॉल्सही दिखाई देंगे । धरती पर हरियाली कही भी नही होंगी। यूँ कहिये की हरियाली धरती से गायब हो गई होंगी जरा गौर कीजिये और सोचिये की ऐसा हुआ तो क्या हालत होगी इस इन्सान की। हमारी भावी पीढी क्या कहेगी हमारे बारे में। किस कदर वो हमें कोसेंगे।
शायद वो नौबत उन पर नही आएँगी। शायद वो नौबत न आए इसीलिए आज का इन्सान चाँद पर आशियाना बसने की सोच रहा है। और आज उसे सफलता मिलाती नजर आ रही है। चाँद पर पानी जो मिलने के समाचार आ चुके है। सोचिये दोस्तों सोचिये और सोचिये। गहरे से सोचो।
शायद वो नौबत उन पर नही आएँगी। शायद वो नौबत न आए इसीलिए आज का इन्सान चाँद पर आशियाना बसने की सोच रहा है। और आज उसे सफलता मिलाती नजर आ रही है। चाँद पर पानी जो मिलने के समाचार आ चुके है। सोचिये दोस्तों सोचिये और सोचिये। गहरे से सोचो।
October 27, 2009
पानी बचाए
दोस्तों आज सबसे बड़ा सामाजिक कार्य यह होगा की जादा से जादा पानी की बचत करे। क्योकि इस साल बारिश ठीक से नही हुई है। वैसे भी अब बारिश पहले जैसी नही होती इसलिए हर साल पानी की मात्रा कम हो रही है। पानी बचाना हमारा कर्तव्य हो जाता है। ग्लोबल वार्मिंग के बार तक़रीबन हर रोज ही किसी न किसी टी.व्ही. चेनल पर कुछ न कुछ दिखाया जाता ही है। उसका ख्याल जरुर करना चाहिए।
पानी का उपयोग इस काम में होता है।
१) पिने के लिए
२) खेती के लिए
३) रोज मर्रा की सफाई के लिए
४) कारखानों के लिए
५) बिजली के उत्त्पादन के लिए
i)जल से बिजली का उत्त्पादन
ii) कोयले से बिजली का
iii) अनु ऊर्जा
बिजली के उत्तपादन में पानी का बहुत जादा मात्र में उपयोग होता है. पण बिजली तो पानी के उपयोग से ही बनती है. इसका साफ मतलब निकालता है की यदि हम बिजली की बचत करते है तो पानी की बचत ही हो जाती है. तो फिर हम बिजली ही क्यों न बचाए. और ऐसा करने से हमारे हातों एक बहुत बड़ा सामाजिक कार्य भी संपन्न हो जाता है. तो दोस्तों आगे आये और बिजली की बचत करे.
पानी का उपयोग इस काम में होता है।
१) पिने के लिए
२) खेती के लिए
३) रोज मर्रा की सफाई के लिए
४) कारखानों के लिए
५) बिजली के उत्त्पादन के लिए
i)जल से बिजली का उत्त्पादन
ii) कोयले से बिजली का
iii) अनु ऊर्जा
बिजली के उत्तपादन में पानी का बहुत जादा मात्र में उपयोग होता है. पण बिजली तो पानी के उपयोग से ही बनती है. इसका साफ मतलब निकालता है की यदि हम बिजली की बचत करते है तो पानी की बचत ही हो जाती है. तो फिर हम बिजली ही क्यों न बचाए. और ऐसा करने से हमारे हातों एक बहुत बड़ा सामाजिक कार्य भी संपन्न हो जाता है. तो दोस्तों आगे आये और बिजली की बचत करे.
October 22, 2009
तुम्हारी तस्वीर
चाँदनी रात में जब मैं
आसमां निहारता हूँ
तो
बेसुमार तारो में
मुझे तुम्हारी तस्वीर नजर आती है ।
मैं उस तस्वीर को
अपनी आंखों में समां लेता हूँ।
और तुम्हारी यादों को
समेटते हुए
नींद की आगोश में समां जाता हूँ।
जब सुबह होती है
आसमां में बादल नजर आते है
और मुझे उन बादलों में भी
तुम्हारी ही तस्वीर
नजर आती है।
लेकिन
मैं अपने आंसुओ से
उस तस्वीर को मिटा देता हूँ
और तुम्हे भूल जाता हूँ
चाँदनी रात में
तुम्हे बेशुमार
तारों में धुंडने के लियें।
आसमां निहारता हूँ
तो
बेसुमार तारो में
मुझे तुम्हारी तस्वीर नजर आती है ।
मैं उस तस्वीर को
अपनी आंखों में समां लेता हूँ।
और तुम्हारी यादों को
समेटते हुए
नींद की आगोश में समां जाता हूँ।
जब सुबह होती है
आसमां में बादल नजर आते है
और मुझे उन बादलों में भी
तुम्हारी ही तस्वीर
नजर आती है।
लेकिन
मैं अपने आंसुओ से
उस तस्वीर को मिटा देता हूँ
और तुम्हे भूल जाता हूँ
चाँदनी रात में
तुम्हे बेशुमार
तारों में धुंडने के लियें।
यादों के झरोके से
यादों के झरोखों से जब भी मैं झांकता हूँ
तुम्हारी खिलखिलाती तस्वीर पाता हूँ
और उस तस्वीर को देख
मैं उदास हो जाता हूँ
अपनी तकदीर को कोसता हूँ
दिल ही दिल में रो लेता हूँ
और जब मन भर जाता है रोने से
तो आंसू पोंछ लेता हूँ
दिल को समझाता हूँ
जैसे कुछ हुआ ही न हो
दिल बेचारा गम का मारा
क्या न करता
गम भुलाकर चुपचाप हो जाता है
और मैं यादों के झरोके से फिर झांकनेलगता हूँ.
तुम्हारी खिलखिलाती तस्वीर पाता हूँ
और उस तस्वीर को देख
मैं उदास हो जाता हूँ
अपनी तकदीर को कोसता हूँ
दिल ही दिल में रो लेता हूँ
और जब मन भर जाता है रोने से
तो आंसू पोंछ लेता हूँ
दिल को समझाता हूँ
जैसे कुछ हुआ ही न हो
दिल बेचारा गम का मारा
क्या न करता
गम भुलाकर चुपचाप हो जाता है
और मैं यादों के झरोके से फिर झांकनेलगता हूँ.
जब याद तुम्हारी आती है
जब याद तुम्हारी आती है
वो (नींद) हमसे रूठ कर
ओझल आखोसे हो जाती है.
जब याद तुम्हारी आती है
जब याद तुम्हारी आती है
करवट भी न बदली जाती है
जब याद तुम्हारी आती है
जब याद तुम्हारी आती है
आखो से नदिया बहती है
जब याद तुम्हारी आती है
जब याद तुम्हारी आती है
जब याद तुम्हारी आती है
वो (नींद) हमसे रूठ कर
ओझल आखोसे हो जाती है.
जब याद तुम्हारी आती है
जब याद तुम्हारी आती है
करवट भी न बदली जाती है
जब याद तुम्हारी आती है
जब याद तुम्हारी आती है
आखो से नदिया बहती है
जब याद तुम्हारी आती है
जब याद तुम्हारी आती है
जब याद तुम्हारी आती है
October 17, 2009
October 15, 2009
प्रकृति और मैं
जब मेरे ख़याल
तुम्हारी यादों से टकराते है,
तो मैं एक भयानक आग में
झुलस जाता हूँ।
तब
मेरे भीतर जमीं हुई कल्पनायें
बर्फ की चट्टानों की तरह
पिघलकर बह जाती है।
और
ये पिघली हुई बर्फ
भीतर की आग से
गमों के बादलो में परिवर्तित होकर
दिल के आकाश में
बिजलियाँ कोंधाती है।
और
बादलों की गडगडाहट से
एक क्षण में ही
मेरे जीवन की धरती
फट जाती है।
और मैं
उसमे समां जाता हूँ
कुछ पलों के लिए ।
और तब
मेरी कलम से
शब्दों के आसूं बहकर
कोरे कागज को
नीली स्याही से ढंक लेते है। (रविन्द्र रवि ४/१२/१९८०)
तुम्हारी यादों से टकराते है,
तो मैं एक भयानक आग में
झुलस जाता हूँ।
तब
मेरे भीतर जमीं हुई कल्पनायें
बर्फ की चट्टानों की तरह
पिघलकर बह जाती है।
और
ये पिघली हुई बर्फ
भीतर की आग से
गमों के बादलो में परिवर्तित होकर
दिल के आकाश में
बिजलियाँ कोंधाती है।
और
बादलों की गडगडाहट से
एक क्षण में ही
मेरे जीवन की धरती
फट जाती है।
और मैं
उसमे समां जाता हूँ
कुछ पलों के लिए ।
और तब
मेरी कलम से
शब्दों के आसूं बहकर
कोरे कागज को
नीली स्याही से ढंक लेते है। (रविन्द्र रवि ४/१२/१९८०)
धड़कन
जब उनकी धड़कने
मेरी धडकनों से टकराती है,
तो चटकाने की आवाज आती है।
लगता है किसी का दिल
गिरकर चूर चूर हो गया है,
वो मुझे देखते है
मै उनको देखता हूँ
इस भ्रम में की
शायद उनका दिल टुटा है ।
उनके जाने के बाद
महसूस करता हूँ ,
दिल उनका नही
मेरा टुटा है ।
मेरी धडकनों से टकराती है,
तो चटकाने की आवाज आती है।
लगता है किसी का दिल
गिरकर चूर चूर हो गया है,
वो मुझे देखते है
मै उनको देखता हूँ
इस भ्रम में की
शायद उनका दिल टुटा है ।
उनके जाने के बाद
महसूस करता हूँ ,
दिल उनका नही
मेरा टुटा है ।
October 13, 2009
खुबसूरत जिंदगी
न कोई मूरत है,
न कोई सूरत है,
न कोई चाहत है,
न कोई जरुरत है,
फिर भी मेरे ऐ दोस्त बता,
ये जिंदगी क्यो लगती इतनी खुबसूरत है।
न कोई सपना है,
न कोई सच है,
न कोई साथी hai ,
न कोई माजी है,
फिर भी मेरे ऐ दोस्त बता,
ये जिंदगी क्यो लगती इतनी खुबसूरत है।
( यह कविता मैंने आज १ ३/१०/२००९ को लिखी है)
October 8, 2009
सदिया गुजर जाती है
जीवन में लम्हे लाखो होते है,
दो लम्हों के बिच फासला बहुत होता है,
तुम आखो से ओझल जो हो जाती हो
तो लगता है सदिया गुजर जाती है।
जिंदगी की गलियो में भटक जाते है हम
तुम्हे इन राहों में धुन्दते रह जाते है हम,
तुम आखो से ओझल जो हो जाती हो
तो लगता है सदिया गुजर जाती है।
जिंदगी के चौराहे पर मायूस हो जाते है हम,
उलझन में पड़ जाते है किस रह पे जाना है।
तुम आखो से ओझल जो हो जाती हो ,
तो लगता है सदिया गुजर जाती है।
दो लम्हों के बिच फासला बहुत होता है,
तुम आखो से ओझल जो हो जाती हो
तो लगता है सदिया गुजर जाती है।
जिंदगी की गलियो में भटक जाते है हम
तुम्हे इन राहों में धुन्दते रह जाते है हम,
तुम आखो से ओझल जो हो जाती हो
तो लगता है सदिया गुजर जाती है।
जिंदगी के चौराहे पर मायूस हो जाते है हम,
उलझन में पड़ जाते है किस रह पे जाना है।
तुम आखो से ओझल जो हो जाती हो ,
तो लगता है सदिया गुजर जाती है।
October 7, 2009
इंसानियत
आज सुबह जब मै बाइक पर ऑफिस जा रहा था तो सिग्नल पर मैंने देखा एक बुढा आदमी रास्ता क्रोस कराने में खड़ा था। शायद उसे गाडियो की आवाज ने उसे चौकन्ना कर दिया था। सुना है की ऐसे लोगो को सिक्स्थ सेंस अच्छी देता है। आख़िर उसे सब की चिंता जो होती काश काश काश। खैर, जैसे ही सिग्नल हरा हुआ वहा तैनात ट्राफिक पुलिस ने उस बुढे का हाथ पकड़कर उसे रास्ता क्रोस करवाया। वह आदमी दोनों आखो से अँधा था। मुजे उस आदमी पर तरस आया पर उस पुलिस वाले पर नाज़ हुआ की उसने इंसानियत दिखाई। काश सबको उपरवाला समझदारीसे जिना सिखाये।
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