September 26, 2009

तुम जियो हजारो साल...........( यहाँ क्लिक करे )


"अभी ना जाओ छोड़ कर के जी अभी भरा नही
अभी अभी तो आए हो बहार बन के छाए हो....."
एक सदाबहार और महानकलाकार का ये गीत है। उनका नाम उनका नाम तो हर किसी की जबान पर होता है. नाम ही नहीं उनपर फिल्माया गया हर गाना आज भी जुबान पे आता है तो दिल झुमने लगता है.देव आनंद जिनका सही नाम है "धरम देव पिशोरीमल आनंद" आज देव साहब का जमन दिन है. २६ सितम्बर १९२३ को उनका जन्म हुआ था. आज देव साहब ८६ साल के हो चुके है. आज भी उनका दिल जवा लगता है. जब उन्हें टी.व्ही.पर कभी देखते है.क्या अदाकारी थी देव साहब की. शिर पर वो बालो का फुगा. ओ झूम के बालो को लहराते हुए भागते हुए गीत गाना. उस ज़माने में मुझे लगता है कोई हीरो आज जैसे नाचना गाना नहीं करते थे. उन दिनों बगीचे में या तो कही जंगल में या समुन्दर किनारे भागते हुए गाने गाये जाते थे।
देव साहब का पहिली करिअर जब मै नेट से धुन्धने लगा तो पता चला की बतौर हीरो १९४६ में उनकी पहली फिल्म आई थी "हम एक हैऔर उनकी आखिरी फिल्म २००५ में आई थी " मि.प्राइम मिनिस्टर" लेकिन शायद अभी २००९ में मुझे हल्का सा यद् आ रहा है की वे फिर किसी फिल्म में कम कर रहे ऐसी ख़बर पढ़ी थी।
इसीलिए उन्हें सदाबहार कलाकार कहते है। इश्वर से प्रार्थना करता हु देव साहब को लम्बी उम्र देन
" तुम जियो हजारो साल
साल के दिन हो पचास हजार"


September 22, 2009

मै गुनहगार हूँ

मै गुनहगार हु इस देह का,
जिसकी चिता मैंने ३० साल पहले ही सुलगा दी थी।
जिसे मै 3० साल से तिल तिल कर जला रहा हूँ,
मेरा देह भीतर ही भीतर झुलस गया है उस आग से,
मै उन जख्मो को देख भी तो नही सकता,
जख्मो पर मरहम भी तो नही लगा सकता,
मै कुछ भी तो नही कर सकता,
मै कुछ भी तो नही कर सकता।
मैं बार बार बार उससे कहता हूँ मुझे बख्श दो,
"कुछ पल " की है जिंदगी जी भर के तो जीने दो
मगर वो है की मानती ही नही
मेरी परेशानियाँ जानती ही नही
मेरा जीवन अब हो गया है धुआ
इंतजार है मुझको कही से मिले दुआ
जो मैं उसकी दिल्लगी को लताड़ दू
अपनी जिंदगी को उसकी आगोश से निकाल दू
पर ये होगा की नही, ये मै नही जानता।
मै गुनहगार हूँ उनका जो मुझे
दिलो जां से चाहते है,
मै गुनाहगार हूँ मेरे अपनो का,
लेकिन मै कुछ भी तो नही कर सकता,
में कुछा भी नही कर सकता।
मेरा दिल अन्दर ही अन्दर जलता है
आग सी सुलगती है मेरे अन्दर
बहुत ही चाहता हूँ मै
सिगरेट छोड़ना पर अब मेरे हाथो मै कुछ नही
अब जो करना है उसे ही करना है
मै अब मेरा नही रहा !

धुम्रपान

मैं दरअसल धुम्रपान करना ही नही चाहता पर क्या करू मन है की मानता ही नही। रत मे जब बिस्तर पे लेटता हूँ तब बहुत तकलीफ होती है। रात भर सोचता रहता हूँ, कसमे खाता हूँ की कल सुबह से बिल्कुल सिगरेट नही पिऊंगा। लेकिन रोज सुबह उठने के बाद पता चलता है की मेरी सोच काफी कमजोर है। सिगरेट में काफी दम है। वह मुझे खिचकर उस दुकान पर ले ही जाती है जहा सिगरेट मिलती है। दोस्तों क्या करू सिगरेट छोड़ना है यह सोचते सोचते जिंदगी के तकरीबन ३० साल गुजर गए , लेकिन वो कामिनी दूर न हो सकी। कोई मुझे बताएगा क्या करना चाहिए मुझे की मेरी यह दुनिया की सबसे बुरी आदत छुट जाए। कृपया सलाह दे। आपकी सलाहों का इंतजार है।

नींद आती नही

आखो से कोसो दूर है ओ ।

परेशां हो जाता हूँ जो न दिखे ओ।

दिल को बहुत समझाता हूँ।

दिल है के मानता ही नही।

ओ है की आती ही नही।

क्या करू क्या न करू,

सोच कर और भी दूर भाग जाती है ओ।

चाहता हूँ बहुत उसे पर दूर ही रहती है जो।

नींद कहते है उसे लोग ये सुना है हमने।

September 21, 2009

आशियाना

इस धरतीपर वास करानेवाला हर एक जिव अपने रहने के लिए आशियाना तलाशता है। हर प्राणी का बच्चा आपनी माँ की गोद में आशियाना पाता है। वाही उसके लिए आशियाना होता है। बड़ा होने पर वह भी अपने आशियाने की तलाश करना सुरु कर देता है। इन्सान मात्र इन सबसे अलग होता है। पैदा होने से अंत तक अपने ही माता -पिता के साये में मतलब आशियाने में बड़ा होता है। लेकिन जनसँख्या बढ़ जाने से नए नए आशियाने तयार किए जाते है। प़ता नही वह खुदा ऊपर से जब देखता होगा तो क्या सोचता होगा। उसे चारो तरफ घर ही घर नजर आते होंगे। इन्सान ही इन्सान नजर आहते होंगे। वही भगवान जब पृथ्वी के भविष्य में झांक कर देखता होगा तो क्या पाता होगा। अंदाज लगाइए जरा। क्या नजारा दिखता होगा उसे इस धरती का। भगवान को धरती पर चारो तरफ शिर्फ और शिर्फ घर, इमारते, बड़े बड़े मॉल्सही दिखाई देंगे । धरती पर हरियाली कही भी नही होंगी। यूँ कहिये की हरियाली धरती से गायब हो गई होंगी जरा गौर कीजिये और सोचिये की ऐसा हुआ तो क्या हालत होगी इस इन्सान की। हमारी भावी पीढी क्या कहेगी हमारे बारे में। किस कदर वो हमें कोसेंगे।
शायद वो नौबत उन पर नही आएँगी। शायद वो नौबत न आए इसीलिए आज का इन्सान चाँद पर आशियाना बसने की सोच रहा है। और आज उसे सफलता मिलाती नजर आ रही है। चाँद पर पानी जो मिलने के समाचार आ चुके है। सोचिये दोस्तों सोचिये और सोचिये। गहरे से सोचो।

September 19, 2009

मेरा मन और धुम्रपान

अभी अभी मुझे पता चला है।
मेरा मन मुझसे
खपा हो चला है।
नजदीक जाऊ तो गुर्राता है ।
मै परेशां हो जाता हूँ ।
पूछने पर वो कुछ भी बताने से कतराता है।
थोडी हिम्मत जुटाई
उसे प्यार से पुकारा और
पूछा तो उसने बताया ,
मै तुमसे बहुत खफा हूँ ।
तुम रोज रात को मुझसे वादा करते हो।
की तुम कल से धुम्रपान नहीं करोगे
लेकिन सुबह होते ही उसे गले से लगाते हो ।
मुझ से किये वादे भूल जाते हो ।
मै क्या करता,
चुपचाप उसके सामने गर्दन झुकाए खडा रहा .
मुह से एक शब्द भी न निकाल सका।
मन ही मन सोचता रहा,
और रात पुनः वादा करने को तैयार हो लिया ।

September 18, 2009

"मेरा मन और महंगाई"

कल रात अँधेरी रात थी,
अचानक मुझे सिसकिया सुनाई दी,
मै सकपकाया ,
मेरे ही घर में ये कौन आया,
मैं घबराया ,
पीछा किया उन सिसकियों का और
मेरे मन को रोता पाया ,
मेरा मन रो रहा था,
आसू बहा रहा था ,
बाल नोच रहा था ,
बिलख रहा था ,
आख़िर मुझसे देखा नहीं गया ,
रहा नहीं गया ,
मैंने उससे पूछ ही डाला,
तू काहे को रो रहा है
वो बोला महंगाई से मैं झुलस गया हूँ ,
खाने पिने को तरस गया हूँ,
मैं तिन दिन से भूखा हूँ,
मगर भूख सहता हूँ,
क्यों की मेरे पास मोबाईल है ,
मैं अपने दोस्तों से,
मन भर के बाते ज्यो करता हूँ,
चलो मुझे तिनके का सहारा तो मिला,
मेरा चेहरा तो रहता है खिला खिला,
क्या हुआ यदि खाने को कुछ न मिला ।
( दोस्तों यह कविता मैंने अभी १९/०९/२००९ को लिखी हे)


September 17, 2009

बुढापा जो बरपा है

अभी अभी मैं नींद से जागा हूँ,

नींद में मैंने सपना देखा,

सपने में एक बड़ा सा आइना देखा
आईने में खुद को निहारते देखा
देखते ही में लडखडाया
जल्द ही खुद को संभाल न पाया
क्योकि
आईने में ख़ुद को जरुरत से ज्यादा बुढा पाया
बालो का वो सफेद रंग

मुझको बिलकुल नहीं भाया
पर क्या करू?

हालात को झूठलातो नहीं सकता
बुढापा जो बरपा है

छुपा तो नहीं सकता
खुदा ने दिया है

जीवन उसे जी भर कर तो जीना है
बुढे हुए ये सोच कर तो न मरना है
मरने की सोच आते ही

मै नींद में भी डर गया
ख़ुद संभलते संभलते ही

लड़खड़ाके गिर गया
गिरते ही नींद खुल गयी
और उठा तो सीधे कंप्युटर पे आ गया
और अपना वो सपना

ब्लॊग पर लिख गया

मेरा जीवन

ये जीवन भी क्या जीवन है।
क्या ये जीवन भी जीवन है?,
इस जीवन में कहा है जल
कहा है पेड़ पौधे इसमें
कहा नदी और नाले दिखते
दूर दूर तक देख चूका हूँ
बस यहाँ दिखता है मरुस्थल,
ये जीवन भी क्या जीवन है,
क्या ये जीवन भी जीवन है?

September 14, 2009

मैं व्यस्त हूँ (१९/२/१९८१)

मेरे जीवन की क्षणिकाओं मुझे मत छेडो,
मै व्यस्त हूँ अपने आपको लेकर
एक नई सृष्टि के निर्माण में,
उस नूतन सृष्टि के
जो मुझमे, मेरे अपने में है।
मैं विकृत हूँ,
मुझे मत छेडो ऐ क्षणीकाओ
मत छेडो मुझे,
वरन
किसी ग्रसित विणां की तरह,
मैं झंकृत हो जाऊंगा,
उसके टूटे हुए तारो की झंकार
तुम नही सुन सकोगी,
मै व्यस्त हूँ
विकृति को
सुकृत बनाने में
मुझे मत छेडो
मेरे जीवन की क्षनिकाओ मुजे मत छेडो,

मेरा मन

मैंने कोलेज के ज़माने मे कुछ कविताये लिखने की हिम्मत जुटी थी. उन्हें इस ब्लॉग पर पेश किया है. वैसे तो मुझे बचपन से ही इन चीजो में दिलचस्पी रही है. कोलेज में थोडा जूनून चढ़ गया था. सो लिख डाली सीधी साधी हिंदी में कविताये.कुछ चित्रकारी भी कर लेते थे. एक बार नोकरी करनी सुरु की और घर वालो ने सब को बांध देते है वैसे ही मुझे भी एक खूटे से बांध दिया. अजी गलत मत समझिये उन्नोने मेरी शादी जो कर दी. अजी फिर एक बार बिनती करता हूँ गलत मत समझिये. उन्नोने मेरी शादी कर दी तो मै भाई घर गृहस्थी मे उलझ गया और कविता या चित्रकला ऐसे कोई और चीजो को हाथ भी न लगा सका. आज ५० को पार कर चुके है, सभी समजदार हो गए है, बच्ची ने ब्लॉग लिखना सिखा दिया तो इसमे उलझाना सुरु कर दिया खुद को. एक अलग ही जूनून है अब. मजा आता है. अपनी वो २५-26 साल पुरानी डायरी बाहर निकली और उसके पन्ने पलटने सुर कर दिए. अपनी वो पुरानी लिखी हुई कविताये ब्लॉग मे डालना सुरु कर दिया. आप पढिये और अपना मत प्रर्दशित कीजिये।

मै अपनी हर एक कविता पर जिस साल वोमैंने लिखी है वह साल लिख रहा हूँ

September 11, 2009

मृग तृष्णा


ये दुनिया नही मेला है,
मुसाफिरों का झमेला है,
यहाँ भाई, बहन, माता-पिता,
हर आदमी बस अकेला ही अकेला है
ये दुनिया नही मेला है

सबकी आखों मे एक सपना है,
ये वो और वो भी अपना है,
परन्तु मरने के बाद ,
सब साथ छोड़ देते है,
हमेशा के लिए,
ये जीवन बस मृगतृष्णा है

जिंदगी


जिंदगी गुजर रही है
इंतजार करते-करते।
सोचते है हम की,
साँझ ढले तो कोई आएगा
बुझे हुए दीपक कोजलाने के लिए।