November 30, 2009

जिंदगी

जिंदगी क्या है, पूछना चाहते हो,
देखो
एक कंकड़ पानी के समाव में डाल दो,
उसके आस पास लहरे उठेगी,
बस यही है जिंदगी,
उतर चढाव है जिंदगी के
जो जमन होते ही घेर लेते है,
अंत में छोटे है उसे।

November 29, 2009

बहार कहा से लाऊ

आँखों से टपकते आसुओ को जब मै देखता हु,
लगता है मेरे जख्मो से टपक रहा है जैसे लहू,
तेरे नैनो में मेरी दुनिया बसी है सारी,
वो यदि सागर में समां जाए तो मै कहा जाऊ।

तेरे प्यार की खातिर हमें जीना पड़ेगा,
गमो की आग में जलकर भी जीना पड़ेगा,
बहारो को देखकर हमें किस्मत पर रोना पड़ेगा,
तेरी याद में ख़ुद को डुबोना पड़ेगा।

मन को बहलाना पड़ेगा मदिरा पी पी कर
राते गुजारनी पड़ेगी कुछ खो खो कर,
बेदर्दी दुनिया के जुल्मो को झेलना पड़ेगा,
ख़ुद को उस काबिल बनाकर।

तू चली गई, तेरी यादो के दायरे भी चले गए यदि
तो मेरे उजड़े हुए चमन में
फिर बहार कहा से लाऊ।
( दोस्तों यह कविता मैने २८/०६/१९८० को लिखी थी.)

November 28, 2009

आहट

(दि। १३/११/१९८० को लिखी एक कविता मई यहाँ पेश कर रहा हु)
कोई दिल के द्वारे पे
धीरे-धीरे आता है।
फिर उस पे दस्तक दे
कही छुप जाता है।
दिल धड़कने लगता है।
कौन है जो आकर भी
कही छुप जाता है।
न रुला मेरे दिल को,
आ भी जा आ भी जा।
जब मै अकेले में
अंधेरे में बैठा हु
कोई आहट दे अंधेरे में खो जाता है
नज़रे फिर दूर दूर तक दौड़ती है
न मिलने पर किसी के
ये नज़रे उदास हो जाती है
न भूल मुझको तू
आ जा आ भी जा।
तेरे आने की आहट जब होती है
मेरे दिल के तार तब झन झना उठाते है
कोई धुन बजती है तेरी आहट पर
वो भी रुक जाती है, तेरे छुप जाने पर
मुझे आवाज तू दे, न भुला
आ भी जा आ भी जा.
तेरी याद आती है
बहारे खिल जाती है
सितारे निकल आते है
चाँद मुस्कराता है
फूल बरसते है
तेरे कदमो पर
न ठुकरा हमें
आ भी जा भी जा.

अहम्...

(१२-२-१९८० को लिखी हुई एक कविता यहाँ आपके खिदमत में पेश कर रहा हु। )
अहम् न करो हे मानव,
न बनो तुम दानव,
अहम्,
तो दानव का प्रतिरूप है।
हे मानव,
तू अहम् करता है
इन कौडियों के सहारे
आँखे तरेरता है
क्यो अपने करेक्टर का नाश करता है
अरे
ये दौलत तो चार दिन की है
हाथ का मैल है ये तो
ये वो चीज है
जो आज यहाँ
कल वहा रहती है
आज तू धनवान है
कल निर्धन हो जाएगा
अरे
एक दिन एक काला कौवा आएगा
इन सोने की कौडियों को
मोती समझकर
और ख़ुद को हंस मानकर
निगल जाएगा
और तू देखता ही रह जाएगा
हो जाएगा
मोहताज तू कौड़ी कौड़ी के लिए
न पूछेगा तेरा भाई
न पूछेगा बेटा तुझे
तू एक जून रोटी के लिए
तरस जाएगा।
हे मानव अहम् न कर तू
न कर अहम्।

November 27, 2009

२६/११


उन शहीदों को श्रद्धांजलि

November 21, 2009

खुबसूरत जिंदगी

ना कोई मूरत है,
ना कोई सूरत है,
ना कोई चाहत है,
ना कोई जरुरत है,
फिर भी ये जिंदगी
क्यो लगती इतनी खुबसूरत है।
ना कोई सपना है,
ना कोई सच है,
ना कोई साथी है,
ना कोई माझी है,
फिर भी ये जिंदगी
क्यो लगती इतनी खुबसूरत है।

November 12, 2009

बुढापा

मेरे घर के दरवाजे पर कोई दस्तक देता है
मै दरवाजा खोलता हु तो उसे देख हैरान होता हु
वो आया है मेरे दरवाजे पे बिन बुलाये मेहमान कि तरह
जिसे मै सब अपने आप से कोसो दूर रखना चाहते है
मै क्या करू उसे कैसे भागवु समझ नही पाता हु
समजते समजते हि शाम ढल जाती है
वो है कि दरवाजे पर से हटता हि नही है
क्या करू क्या न करू सोचते सोचते थक जाता हु
और उस आगंतुक को आपने घर मे हि पनाह दे देता हु
अपनी जिंदगी के अंत तक रहने के लिये
जिसका नाम लेने से भी लोग कतराते है
मै उसे अपने हि घर में पनाह देता हु
जिसे सब बुढापा कहते है उसे हि मै गले से लगाता हु.

November 10, 2009

शराब

शराब के भी रंग होते है.
पीने के भी ढंग होते है.
एक
जो गम को भुला देती है
दुसरी
जो बेचैन कर देती है.

November 9, 2009

तलाश

मैंने अपना बचपन मध्य प्रदेश राज्य के नेपानगर नाम के छोटेसे शहर में बिताया है. यह शहर इसलिए कहरहा हु की पेपर मिल की वजह से यहाँ की बस्ती बहुत ही अच्छी है. १९६८ से १९७७ तक का मेरा जीवन पूरी तरह इसी शहर में बिता है. मै एक गरीब घर में पैदा हुआ था इसलिए झोपडी में रहता था. लेकिन पढाई में हमेशा प्रथम आता था. इसलिए स्कुल में सब टीचर मुझे चाहते थे. दोस्त भी सब मुझसे दोस्ती करते थे माफ करना मै अपनी ही तारीफ के पुल बंधने लग गया हु.
तो बात ये है की मेरे घर में लाईट की व्यवस्था न होने से पढाई में बहुत दिक्कत होती थी. इसलिए दोस्त लोग अपने घर बुला लेते थे. कई बार तो मेरे टीचर जो हॉस्टल में रहते थे वे भी मुझे पढाई करने के लिए उनके रूम पर बुला लेते थे. इस तरह मेरा जीवन व्यतीत हो रहा था. मेरे साथ पढ़ने वाला एक दोस्त था जिसका नाम था अविनाश माथुर. उसके पिता मिल में इंजिनीअर थे सो उन्हे रहने के लिए अच्छा घर मिला हुआ था. एक दिन वो दोस्त मुझे अपने घर ले गया. वहा उसने अपनी माँ से कुछ बात की और उसकी माँ ने मुझे परीक्षा के दिनों में उनके घर पढाई के लिये आने को कहा. इस तरह मै उनके घर रत को जाने लगा. रात में पढाई कृते वक्त उसकी माँ हमें बादाम का दूध पिने के लिये देती थी. उसकी छोटी बहन मेरे आने पर एक गाना गति थी " बम्बई से आया मेरा दोस्त, दोस्त को सलाम करो" उस समय यह गाना नया ही था. (उन दिनों मुंबई को बम्बई कहते थे).
परीक्षा होने पर फिर किसी और जगह हमारा मुकाम होता था. एक दिन पता चला वह दोस्त हमारा शहर छोड़ गया. कारन पता नहीं चला.लेकिन आज भी वो यद् आता है. उसकी तस्वीर मेरे पास है जो मै यहाँ दे रहा हु.

एक दिन की बात थी....

एक दिन कि बात थी
अंधेरी रात थी
वो बैठी मेरे साथ थी
चल रही बरसात थी
वो भिगी हुई थी
सहमी हुईसी थी
थंड से काप रही थी
हमने साथ रहने कि सौगंध खाई थी
फिर भी क्या हुआ
ऐ रब्बा कि वो मुझसे यु खफा हो गई
जिंदगी के अंधेरी गलीयारो मे
यु भटकने के लिये अकेला छोड गई
तुझे इतनी भी दया नाही आई
कि मै अकेले कैसे जी पाऊंगा