October 15, 2009

प्रकृति और मैं

जब मेरे ख़याल
तुम्हारी यादों से टकराते है,
तो मैं एक भयानक आग में
झुलस जाता हूँ।
तब
मेरे भीतर जमीं हुई कल्पनायें
बर्फ की चट्टानों की तरह
पिघलकर बह जाती है।
और
ये पिघली हुई बर्फ
भीतर की आग से
गमों के बादलो में परिवर्तित होकर
दिल के आकाश में
बिजलियाँ कोंधाती है।
और
बादलों की गडगडाहट से
एक क्षण में ही
मेरे जीवन की धरती
फट जाती है।
और मैं
उसमे समां जाता हूँ
कुछ पलों के लिए ।
और तब
मेरी कलम से
शब्दों के आसूं बहकर
कोरे कागज को
नीली स्याही से ढंक लेते है। (रविन्द्र रवि ४/१२/१९८०)

1 comment:

अल्पना वर्मा said...

और तब
मेरी कलम से
शब्दों के आसूं बहकर
कोरे कागज को
नीली स्याही से ढंक लेते है।

-वाह! सुन्दर कविता..

कविता का जन्म ही भावनाओं के उमड़ने से होता है..