(दोस्तों मेरी दि ११/०८/१९९६ को लिखी एक कवीता यहाँ आपकी खिदमत में पेश कर रहा हुं। अच्छी लगे तो अपनीप्रतिक्रियाये जरुर देना। मुझे अच्छा लगेगा। और इससे लिखने वलेका हौसला भी बढ़ता है। आभार! )
मुझे मत सताओं ऐ दुनियावालों
मै पहले से ही बहुत परेशाँ हूँ
ज़िन्दगी से हैराँ हूँ
मुझे ही क्यों मिले है ये सारे ग़म
क्याँ अब भी बाक़ी है देना
मुझे कुछ सितम
क्याँ भर डालोगे मेरी झोली
इन गमों से
मत परेशाँ करो मूझे
ऐ दुनियावालों मै पहले से ही परेशाँ हूँ
ज़िन्दगी से हैराँ हूँ।










