April 13, 2010

कटी पतंग



दोस्तों आज मै यहाँ मेरी अपनी लिखी एक और कविता पेश कर रहा हुयह कविता मैंने २३-०३-१९८२ को लिखीथी जब मै इन्दोर में इंजिनीअरिंग कोलेज में पढ़ रहा था.
"इंसा" नाम है उस पतंग का,
जो जीवन रूपी आकाश में
वक्त रूपी कच्ची डोर से बंधी हुई
विचरती रहती है।
और
जब मौत रूपी गीदड़
उस आकाश में विचरते है
तो रस्ते में आने वाले सभी पतंगों को कांट देते है
और
वो पतंग
एक कटी पतंग की तरह गिरकर
धरती की गोद में समां जाती है।

( रविन्द्र रवि 'कोष्टी' )

2 comments:

संजय भास्कर said...

हर शब्‍द में गहराई, बहुत ही बेहतरीन प्रस्‍तुति ।

Sanjay kumar
http://sanjaybhaskar.blogspot.com

Ravindra Ravi said...

धन्यवाद संजयजी!