September 19, 2009

मेरा मन और धुम्रपान

अभी अभी मुझे पता चला है।
मेरा मन मुझसे
खपा हो चला है।
नजदीक जाऊ तो गुर्राता है ।
मै परेशां हो जाता हूँ ।
पूछने पर वो कुछ भी बताने से कतराता है।
थोडी हिम्मत जुटाई
उसे प्यार से पुकारा और
पूछा तो उसने बताया ,
मै तुमसे बहुत खफा हूँ ।
तुम रोज रात को मुझसे वादा करते हो।
की तुम कल से धुम्रपान नहीं करोगे
लेकिन सुबह होते ही उसे गले से लगाते हो ।
मुझ से किये वादे भूल जाते हो ।
मै क्या करता,
चुपचाप उसके सामने गर्दन झुकाए खडा रहा .
मुह से एक शब्द भी न निकाल सका।
मन ही मन सोचता रहा,
और रात पुनः वादा करने को तैयार हो लिया ।

3 comments:

चंदन कुमार झा said...

बहुत सुन्दर भावप्रधान रचना । आभार ।

Ravindra Ravi said...

धन्यवाद चन्दनकुमारजी

Ravindra Ravi said...
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