September 11, 2009

जिंदगी


जिंदगी गुजर रही है
इंतजार करते-करते।
सोचते है हम की,
साँझ ढले तो कोई आएगा
बुझे हुए दीपक कोजलाने के लिए।

2 comments:

संजय भास्कर said...

कम शब्दों में बहुत सुन्दर कविता।
बहुत सुन्दर रचना । आभार
ढेर सारी शुभकामनायें.

Sanjay kumar
http://sanjaybhaskar.blogspot.com

Ravindra Ravi said...

आभार संजयजी.