January 3, 2011

जिंदगी

जिन्दगी
तू क्या क्या रंग दिखलाती है,
कभी दिन कभी रात ला
हमे अच्छे और बुरे का पाठ पढाती है।

7 comments:

संजय भास्कर said...

बहुत खूब, लाजबाब !

Ravindra Ravi said...

धन्यवाद संजयजी!

mridula pradhan said...

bahut achche.

दीप said...

जिंदगी के रंग तो बहुत अनोखे हैं

Ravindra Ravi said...

आपका बहुत बहुत धन्यवाद मृदुलाजी और दिपजी!

दर्शन कौर धनोए said...
This comment has been removed by the author.
दर्शन कौर धनोए said...

रविनदर जी , आपकी दोनों ही रचनाऐ काबिल -ऐ - तारीफ है |
आपने तो जिन्दगी के मायने ही बदल दिए .....
साहिर साहब ने क्या खूब कहा है की -
"जिन्दगी एक सुलगती -सी चिता है ' साहिर'
शोला -बनती है न ये बुझ के धुँआ होती है |"