December 12, 2011

जीवन का पथ

जीवन के पथ पर जो चलता जाता है,
बेधड़क, बेझिझक, बेखबर,
वही अंतिम पड़ाव तक पहुच पाता है  
बेधड़क, बेझिझक, बेखबर!


10 comments:

संजय भास्कर said...

बहुत खूबसूरत सोच
सटीक लिखा है आपने! सुन्दर चित्र के साथ उम्दा प्रस्तुती!

sushma 'आहुति' said...

भावमय करते शब्‍दों का संगम.....

महेन्द्र श्रीवास्तव said...

वाह सुंदर

Pravin Dubey said...

सुंदर रचना...

रविंद्र "रवी" said...

धन्यवाद संजयजी और प्रविणजी!

रविंद्र "रवी" said...

महेन्द्रजी, आभार!

रविंद्र "रवी" said...

सुषमाजी,बहुत बहुत शुक्रिया!

Mamta Bajpai said...

आत्मविश्वास से परिपूर्ण रचना
बहत सुन्दर ...बधाई

Sikta said...

पथ को पथाये मानेगा नहीं ,गंतव्य पर धरेगा अंतिम पग बेधडक .

Mr. Roshan Dhar Dubey said...

किसि को एक पग मे सहारा मिल जाता है,
तो किसि से एक पग पे हि सहारा छिन जाता है,

अक्सर जिन गलियो से गुजरते है हम,
वहां कोइ ना कोइ दिल से हारा मिल जाता है,

बेचैन होता है कोइ किसि के लिये,
तो कोइ आंखो मे आंसु लिये मिल जाता है,

किसि को जिंदगि भर के लिये मिलति है खुशियां,
तो किसि के हिस्से मे दो पल हि खुशि का आता है !

लेखक:रोशन दूबे
लेखन दिनाँक: 14 दिसम्बर २०११ (सायकाल 8 बजे)
http://rdshayri.blogspot.com/2011/12/blog-post_14.html