June 13, 2010

यह तृष्णा नहीं बुझेगी.



यह तृष्णा अब नहीं बुझेगी,
कभी नहीं बुझेगी यह तृष्णा अब।
चाहे जो भी हो जाए,
धरती फट जाए,
या सुखा पड़ जाए,
चाहे वो भूखो मर जाए,
यह तृष्णा अब नहीं बुझेगी।
हां मै सिर्फ धन का प्यासा हु
धान का नहीं,
मेरी प्यास सिर्फ धन के लिए है,
इसलिए जब तक मेरा मन न भर जाए
मै धन कमाना चाहता हु,
हां मै आखिरी दम तक सिर्फ धन कमाना चाहता हु।
यही मेरी मंजिल है।
यही मेरी प्यास है,
और यह प्यास यह तृष्णा मरते दम तक नहीं बुझाने वाली।
( दोस्तों आज हर कोई धन दौलत कमाने के पीछे पड़ा है। चाहे कुछ भी हो जाए उसे तो बस धन दौलत चाहिए। इसी विषय पर आधारित यह आज की मेरी कविता आपकी खिदमत में पेश है।)
रविन्द्र 'रवि' १३ जून २०१०

2 comments:

संजय भास्कर said...

मेरी प्यास सिर्फ धन के लिए है,
इसलिए जब तक मेरा मन न भर जाए
मै धन कमाना चाहता हु,


सानदार प्रस्तुती के लिऐ आपका आभार

Ravindra Ravi said...

चलो मेरी कविता से किसी को प्रोत्साहन तो मिला! हा जाब मन भर जाये तो मुझे जरूर बताना.