July 20, 2010

शायद

शायद,
रोज रात चाँद आँसमाँ से तुम्हे देखता है,
और
तुम्हारी खुबसुरती की रोशनी से अपनी आँखे चुरा लेता है,
शायद,
उसे डर लगता है
कही दुनियावाले तुम्हे ही चाँद न समझ बैठे
शायद
इसी डर से वो हौले हौले छुपता है
और
एक दिन पुरी तरह लुप्त हो जाता है
शायद
उसी रात को अमावस की रात कहते है.
और फिर
जब सभी तारें आँसमाँ में
एक होकर उसे समझाते है
वो हौले हौले झाँक झाँक कर तुम्हे निहारता है
और
जब उसका डर दुर हो जाता है
वह पुरी तरह आँसमाँ में छा जाता है
शायद उसी रात को
लोग पुनम की रात कहते है.

15 comments:

संजय भास्कर said...

कुछ तो है इस कविता में, जो मन को छू गयी।

संजय भास्कर said...

Maaf kijiyga kai dino bahar hone ke kaaran blog par nahi aa skaa

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

शायद ..ऐसा ही होता होगा....पर हर १४ दिन बाद उसे डर लगता है और फिर १४ दिन बाद ही उसका डर भाग जाता है....

कल्पना को अच्छे शब्द दिए हैं

कविता रावत said...

शायद,
रोज रात चाँद आँसमाँ से तुम्हे देखता है,
और
तुम्हारी खुबसुरती की रोशनी से अपनी आँखे चुरा लेता है,
शायद,
उसे डर लगता है
कही दुनियावाले तुम्हे ही चाँद न समझ बैठे
..khoobsurat khayal.. laajab rachna

Ravindra Ravi said...

आपकी प्रतिक्रिया भी इसी तऱ्ह मन को छु जाती है. धन्यवाद!

Ravindra Ravi said...

धन्यवाद संगीताजी! धन्यवाद कविताजी !

देवेश प्रताप said...

बेहतरीन रचना ....

Ravindra Ravi said...

Thanks Deveshji!!!

Shayar Ashok said...

उम्दा ...
लाजवाब प्रस्तुती ||

Ravindra Ravi said...

एक शायर दाद दे इससे बडी बात और क्या हो सकती है! शायर अशोकजी आपका तहेदिल्से शुक्रिया!

mridula pradhan said...

very good.

***Punam*** said...

khoobsurat nazm....
shukriya !!

***Punam*** said...

khoobsurat nazm...
shukriya !!!

Ravindra Ravi said...

मृदुलाजी शुक्रिया!

Ravindra Ravi said...

पुनमजी, आप हमारे यहाँ कुछ पल आये और अपने हातो से समीक्षा दर्ज कर हमें सराहा इसके लिए आपका शुक्रिया.