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September 11, 2009

मृग तृष्णा


ये दुनिया नही मेला है,
मुसाफिरों का झमेला है,
यहाँ भाई, बहन, माता-पिता,
हर आदमी बस अकेला ही अकेला है
ये दुनिया नही मेला है

सबकी आखों मे एक सपना है,
ये वो और वो भी अपना है,
परन्तु मरने के बाद ,
सब साथ छोड़ देते है,
हमेशा के लिए,
ये जीवन बस मृगतृष्णा है