
ये दुनिया नही मेला है,
मुसाफिरों का झमेला है,
यहाँ न भाई, न बहन, न माता-पिता,
हर आदमी बस अकेला ही अकेला है।
ये दुनिया नही मेला है।
सबकी आखों मे एक सपना है,
ये वो और वो भी अपना है,
परन्तु मरने के बाद ,
सब साथ छोड़ देते है,
हमेशा के लिए,
ये जीवन बस मृगतृष्णा है।
मुसाफिरों का झमेला है,
यहाँ न भाई, न बहन, न माता-पिता,
हर आदमी बस अकेला ही अकेला है।
ये दुनिया नही मेला है।
सबकी आखों मे एक सपना है,
ये वो और वो भी अपना है,
परन्तु मरने के बाद ,
सब साथ छोड़ देते है,
हमेशा के लिए,
ये जीवन बस मृगतृष्णा है।