दोस्तों इस साल उत्तराखंड या यु कहे सम्पूर्ण हिमालय परिसर में बारिश ने तबाही मचा रखी है. बारिश भी अजीब होती है. अब तक सुखा पड़ा था अबकी तबाही मची है. प्रकृति है की हमें ना तो ठीक से जीने देती है ना मरने देती.
मै २००७ में हिमाचल प्रदेश में गया था. शिमला में रुका था और नजदीक नाथपा झाकरी प्रोजेक्ट पर गया था. ऑफिसियल काम से ही गया था. उस समय आदतन मैंने सम्पूर्ण शिमला और वहां से उस प्रोजेक्ट ताका के रास्ते का मुआयना किया था.मै तोनजारा देख हैरान हो गया था. वहाँ लोग कैसे जीते होंगे यह सोच भी नहीं पा रहा था. क्योकि हर तरफ पहाड़ी ही थी. पहाड़ी पर ही बिल्डिंगे बनी हुई थी. वो भी २-३ मंजिला नहीं. १०-१० मंजिला. इ़तना ही नहीं सारे रास्ते मनी कई एक्सीडेंट हुए देखे थे. बिल्डिंगे गिरी हुई, बस गिरी हुई. क्योकि भारी बारिश की वजह से रास्ते ढह गए थे. जब हमारी कार ऐसे रस्ते से गुजराती थी तो मै तो दिल थाम के बैठता था.
मैंने देखा की सारा हिमालय मिटटी का बना हुआ है. पत्थर का तो कही पता ही नहीं होता था. तभी मै अपने साथियो से बोला था यदि यहा धुआधार बारिश होती रही तो ये पहाड़ ढह जाने में देर नहीं लगेगी.
दोस्तों आज वही हो रहा है.
पहले हिमालय में बारिश कम हुआ करती थी सिर्फ बर्फ ही पड़ती थी. लेकिन ग्लोबल वार्मिंग की वजह से वहां की बर्फ कम होती जा रही है और बारिश बढती जा रही है.
हमें अब भी मौक़ा है प्रकृति को समझने का वरन वो हमें ही समझा देगी की वो क्या है और उसकी ताकत क्या है.

मैंने देखा की सारा हिमालय मिटटी का बना हुआ है. पत्थर का तो कही पता ही नहीं होता था. तभी मै अपने साथियो से बोला था यदि यहा धुआधार बारिश होती रही तो ये पहाड़ ढह जाने में देर नहीं लगेगी.
दोस्तों आज वही हो रहा है.
पहले हिमालय में बारिश कम हुआ करती थी सिर्फ बर्फ ही पड़ती थी. लेकिन ग्लोबल वार्मिंग की वजह से वहां की बर्फ कम होती जा रही है और बारिश बढती जा रही है.
हमें अब भी मौक़ा है प्रकृति को समझने का वरन वो हमें ही समझा देगी की वो क्या है और उसकी ताकत क्या है.
2 comments:
हमारी आदत हो गई है कि जब भी ऐसी कोई आपदा हो तो प्रकृति को कोसते हैं या फिर ग्लोबल वार्मिंग की बात करने लगते है यह भूल जाते हैं कि हम ही इन सबके कारक हैं.
prakrati se jab tak khilvad hota rhega tab tak yah hota rhega
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