तो बात ये है की मेरे घर में लाईट की व्यवस्था न होने से पढाई में बहुत दिक्कत होती थी. इसलिए दोस्त लोग अपने घर बुला लेते थे. कई बार तो मेरे टीचर जो हॉस्टल में रहते थे वे भी मुझे पढाई करने के लिए उनके रूम पर बुला लेते थे. इस तरह मेरा जीवन व्यतीत हो रहा था. मेरे साथ पढ़ने वाला एक दोस्त था जिसका नाम था अविनाश माथुर. उसके पिता मिल में इंजिनीअर थे सो उन्हे रहने के लिए अच्छा घर मिला हुआ था. एक दिन वो दोस्त मुझे अपने घर ले गया. वहा उसने अपनी माँ से कुछ बात की और उसकी माँ ने मुझे परीक्षा के दिनों में उनके घर पढाई के लिये आने को कहा. इस तरह मै उनके घर रत को जाने लगा. रात में पढाई कृते वक्त उसकी माँ हमें बादाम का दूध पिने के लिये देती थी. उसकी छोटी बहन मेरे आने पर एक गाना गति थी " बम्बई से आया मेरा दोस्त, दोस्त को सलाम करो" उस समय यह गाना नया ही था. (उन दिनों मुंबई को बम्बई कहते थे).
परीक्षा होने पर फिर किसी और जगह हमारा मुकाम होता था. एक दिन पता चला वह दोस्त हमारा शहर छोड़ गया. कारन पता नहीं चला.लेकिन आज भी वो यद् आता है. उसकी तस्वीर मेरे पास है जो मै यहाँ दे रहा हु.
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2 comments:
thik hai.
Bahut achhe!!
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